शनिवार, 24 मार्च 2012

मेरे गीत तुम्हारे पास

दुष्यंत कुमार को बहुत पहले से पढ़ते-गाते आ रहा हूँ. जब-तब उनका लिखा होंठों पर थिरकता रहता है. प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल... मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे मेरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएँगे हौले—हौले पाँव हिलाओ,जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने—अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे थोड़ी...

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

सज़ा और सवाल - अहमद फ़राज़

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते ? मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने, आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते ? साया हूँ तो साथ ना रखने कि वज़ह क्या पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते ? ---------- एक संग-...

बुधवार, 13 जुलाई 2011

यह बच्चा कैसा बच्चा है

इब्ने इंशा जी की मशहूर नज्Þम 'कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा' तो सभी ने सुनी होगी। और इस नज्Þम की खूबसूरती में कई बार डूबे भी होंगे। अपने प्रियतम की खूबसूरती को बड़े ही दिलकश अंदाज से बयां किया है इंशा जी ने। हर लफ्ज़ में प्रेम छलकता है। लेकिन प्रेम की इस खूबसूरत रचना का सृजन करने वाले इंशा...

गुरुवार, 17 मार्च 2011

हबीब जालिब, साथी सचिन की कलम से...

अभी तक तो जो कुछ इस ब्लाग पर प्रस्तुत करता रहा, वह अकेले की पसंद थी। लेकिन पिछले दिनों एक लेखक को एक साथी के साथ पढ़ा। मेरे उन साथी ने उस लेखक का पूरा जीवन चित्र ही उकेर दिया है अपने ब्लाग पर। यहां उसी पोस्ट का लिंक दे रहा हूं। इस उम्मीद के साथ कि इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आप खुद को उस शायर के रूबरू...

रविवार, 13 मार्च 2011

चाँद ने क्या-क्या मंज़िल कर ली

यूं तो चाँद तकरीबन हर शायर का प्रिय विषय रहा है, लेकिन इब्ने इंशा का चाँद जैसे उनका ही कोई हिस्सा है। गिनी-चुनी ही रचनाएं होंगी जिनमें इंशा जी ने चाँद का ज़िक्र न किया हो। मोहब्बत का कारोबार समझाते हुए चाँद के तौर-तरीके भी नुमायां हैं इस ग़ज़ल में...  सावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात...