मंगलेश डबराल जी की
चंद पंक्तियों की एक
कविता, पर असल में एक बहुत बड़ी
हकीक़त। जब भी ये कविता जेहन में उभरती
है, तमाम रूपों में मौजूद भेद-भाव और शोषण की तस्वीर भी आँखों के सामने लहराने लगती
है, मन के कोने में दुबकी पड़ी सामंती प्रवृत्ति जो प्रत्यक्ष रूप में भी आज भी अपनी जड़ें जमाये हुए है, कितने पुरजोर तरीके से प्रस्तुत करती हैं ये पंक्तियाँ। साथ ही एक बेहतर स्थिति की उम्मीद भी।
कल रात जब अपने कैमरे में कैद दो तस्वीरों को एक साथ
देखा, तो अनायास ही ये पंक्तियाँ दस्तक देने
लगीं, नतीजा एक पोस्टर के रूप में आपके सामने
है...
(नीचे लिखे नाम (पोस्टर : रजनीश) पर न जायें, क्योंकि मेरे पास इसका कोई तर्क नहीं है कि लिखने के लिए मैंने दूसरा नाम (साहिल) क्यों चुना)